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12 साल में पहली बार संसद में हारी मोदी सरकार – क्या हुआ पूरा मामला

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नई दिल्ली, 18 अप्रैल :

करीब 12 साल में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को संसद के अंदर बड़ा झटका लगा है। लोकसभा में पेश किया गया संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो पाया, जिससे केंद्र सरकार को अपनी पहली बड़ी विधायी हार झेलनी पड़ी।

यह बिल महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33% आरक्षण देने से जुड़ा था, लेकिन इसे परिसीमन (सीटों के पुनर्निर्धारण) से जोड़ दिया गया था—यही इसकी हार की सबसे बड़ी वजह बनी।

क्या था पूरा बिल

यह संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026 था

उद्देश्य: लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण

साथ में प्रस्ताव:

लोकसभा सीटें बढ़ाकर लगभग 850 तक करने की योजना

नई जनगणना के आधार पर परिसीमन (delimitation)

लेकिन विपक्ष ने कहा कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना गलत है।

बिल क्यों हार गया

1. दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला

बिल पास करने के लिए विशेष बहुमत जरूरी था

वोटिंग:

पक्ष में: 298 वोट

विरोध में: 230 वोट

2. विपक्ष पूरी तरह एकजुट रहा

कांग्रेस, DMK और अन्य दलों ने एक साथ विरोध किया

आरोप:

सरकार “महिला आरक्षण” के नाम पर राजनीतिक फायदा लेना चाहती है

3. परिसीमन बना सबसे बड़ा विवाद

दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल) को डर:

उनकी सीटें कम हो सकती हैं

आरोप:

उत्तर भारत को ज्यादा फायदा मिलेगा

4. पर्याप्त राजनीतिक सहमति नहीं बनी

विपक्ष का कहना:

सरकार ने पहले चर्चा नहीं की

बिल जल्दबाजी में लाया गया

यह हार क्यों खास है

मोदी सरकार के 12 साल में पहली बड़ी संसदीय हार

इतने सालों में पहली बार कोई सरकारी बिल लोकसभा में गिरा

इसे 2026 की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना माना जा रहा है

अब आगे क्या प्लान हो सकता है

1. सरकार नया संशोधित बिल ला सकती है

संभावना:

महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करके पेश किया जाए

2. विपक्ष से बातचीत बढ़ेगी

सरकार को अब समझ आ गया है कि बिना सहमति
संविधान संशोधन पास कराना मुश्किल है

3. 2029 चुनाव को ध्यान में रखकर रणनीति

महिला वोट बैंक बड़ा फैक्टर है

सरकार इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जा सकती है

4. “राजनीतिक नैरेटिव” की लड़ाई

सरकार:

“हम महिलाओं के लिए बिल लाए”

विपक्ष:

“सरकार ने राजनीति के लिए बिल लाया”

आने वाले समय में यह मुद्दा चुनावी बहस का बड़ा हिस्सा बनेगा।

एक्सपर्ट नजरिया

यह सिर्फ एक बिल की हार नहीं, बल्कि
नए राजनीतिक समीकरण का संकेत है

2024 के बाद बदली संसद में अब
“संख्या बल + सहमति” दोनों जरूरी हो गए हैं

 

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