भारत, 3 मार्च। देशभर में धुलंडी का पर्व उत्साह और रंगों के साथ मनाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। होलिका दहन के अगले दिन मनाई जाने वाली धुलंडी पर लोग एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर खुशियां बांटते हैं। इस बीच लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर धुलंडी पर रंगों से ही होली क्यों खेली जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण भी जुड़े हुए हैं।
श्रीकृष्ण की परंपरा से जुड़ी शुरुआत
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में राधा और गोपियों के साथ रंगों की होली खेली थी। माना जाता है कि इसी परंपरा से रंगों वाली होली की शुरुआत हुई, जो समय के साथ पूरे देश में लोकप्रिय हो गई।
होलिका दहन के बाद नई शुरुआत का प्रतीक
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसके अगले दिन धुलंडी पर लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, जो प्रेम, क्षमा और नई शुरुआत का संदेश देता है।
प्राकृतिक रंगों का वैज्ञानिक महत्व
प्राचीन समय में पलाश, टेसू और औषधीय फूलों से रंग बनाए जाते थे। मौसम बदलने के दौरान ये प्राकृतिक रंग शरीर की त्वचा के लिए लाभकारी माने जाते थे और संक्रमण से बचाव में भी सहायक होते थे।
सामाजिक एकता का पर्व
धुलंडी को सामाजिक समरसता का त्योहार भी माना जाता है। इस दिन सभी लोग भेदभाव भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, जिससे समाज में भाईचारा और अपनत्व मजबूत होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि रंगों का यह त्योहार केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहरी परंपरा और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक है।
