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अभिभावकों की कलेक्टर से गुहार: निजी स्कूलों की मनमानी पर लगे रोक, महंगी किताब-ड्रेस से बढ़ रहा आर्थिक बोझ

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अलवर, 31 मार्च । नए शैक्षणिक सत्र के साथ अलवर में निजी स्कूलों द्वारा महंगी किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के दबाव को लेकर अभिभावकों की परेशानी बढ़ती जा रही है। अब अभिभावकों ने जिला कलेक्टर से हस्तक्षेप कर कार्रवाई करने की मांग की है, ताकि आम परिवारों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ कम हो सके।

अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी स्कूलों द्वारा चुनिंदा दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के निर्देश दिए जा रहे हैं। स्कूल द्वारा बताई गई दुकानों पर एलकेजी कक्षा तक की किताबों का सेट 1500 से 2000 रुपये तक में मिल रहा है, जिससे मध्यम और सामान्य परिवारों की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है।

तय दुकानों से खरीददारी का दबाव

अभिभावकों का कहना है कि स्कूल केवल बुक लिस्ट देने तक सीमित रहने के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से तय दुकानों से ही पूरा किट खरीदने का दबाव बना रहे हैं। अन्य दुकानों से सामान लेने पर कई बार आपत्तियां जताई जाती हैं।

स्कूल-दुकान कमीशन सिस्टम की चर्चा

अभिभावकों के बीच यह भी चर्चा है कि कुछ मामलों में स्कूल और दुकानों के बीच प्रतिशत (कमीशन) के आधार पर किताबें और ड्रेस बेचने की व्यवस्था होती है। आरोप है कि दुकानदारों को फायदा पहुंचाने के बदले स्कूल प्रबंधन को लाखों रुपये तक का कमीशन दिया जाता है, जिसके कारण सामग्री की कीमतें बढ़ जाती हैं।
हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अभिभावकों ने प्रशासन से इसकी जांच कराने की मांग की है।

क्या कहते हैं नियम? (अभिभावकों के अधिकार)

शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार—

– कोई भी निजी स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से खरीदारी के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

– स्कूल केवल पुस्तकों की सूची जारी कर सकता है।

– एनसीईआरटी व निर्धारित पाठ्यक्रम को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

– स्कूल परिसर में सामग्री की अनधिकृत बिक्री नियमों के विरुद्ध है।

– मनमानी कीमत वसूली उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन मानी जा सकती है।

कलेक्टर से कार्रवाई की मांग

अभिभावकों ने जिला कलेक्टर डॉ आर्तिका शुक्ला से निवेदन किया है कि—

– निजी स्कूलों की बुक लिस्ट और कीमतों की जांच कराई जाए।

– तय दुकानों की अनिवार्यता समाप्त कराई जाए।

– कमीशन सिस्टम की जांच हो।

– अभिभावकों पर बढ़ रहे आर्थिक बोझ को कम करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा सेवा का माध्यम है, व्यवसाय नहीं। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो हर साल फीस और कोर्स सामग्री का खर्च बढ़ता जाएगा।

सामाजिक सरोकार से जुड़ा मुद्दा

शहर के सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि शिक्षा व्यवस्था पारदर्शी और अभिभावक-हितैषी होनी चाहिए। प्रशासन की पहल से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुए बिना परिवारों को राहत मिल सकती है।

बुक्स खरीदने के लिए दुकान पर लगी अभिभावकों कि भीड़।

दुकानों पर लगी अभिभावकों की भीड़ 

नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ बुधवार से स्कूल खुलने जा रहे हैं। इसी कारण शहर की किताब और यूनिफॉर्म दुकानों पर अभिभावकों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है।
अभिभावक दुकानों पर बच्चों की किताबें, बैग और ड्रेस खरीदने पहुंचे, जिससे दुकानों पर लंबी कतारें लग गईं।
अभिभावकों का कहना है कि सीमित दुकानों से खरीदारी के दबाव के कारण एक ही जगह ज्यादा भीड़ हो रही है और महंगे दामों पर सामान खरीदना उनकी मजबूरी बन गया है।

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